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Tuesday, 4 March 2014

विचार-श्रंखला : मार्च-I, 2014

आपत्तियां मनुष्यता की कसौटी हैं, इन पर खरा उतरे बिना कोई भी व्यक्ति सफल नहीं हो सकता है।

विकन्द्रीकरण के इस युग में सपने ही वे कुंजियॉं हैं, जो हर एक को बान्धे रखते हैं।

जब श्रद्धा पैदा होती है, तो वह मार्ग की समस्त बाधाओं को दूर कर देती है। इससे चित्त निर्मल, आनंदित और मुक्त हो जाता है।

जिसको रहस्य गोपनीय रखना नहीं आता, वह सफलता का मुंह नहीं देख सकता।

एक बार मन में शक का कीड़ा रेंग गया, तो उसका इलाज न लुकमान के पास है, न धन्वन्तरि के पास।

दुनिया में तरक्की के बावजूद पत्रकारों का संघर्ष अभी भी खत्म नहीं हुआ है और न ही कभी हो पाएगा।

उपयोग और नयी बात सीखने के लिए सबसे पहले मस्तिष्क को खाली और निर्मल करना जरूरी है।

संकल्प करें कि मुझे सहन करने की शक्ति का विकास करना है। यह संकल्प महान बनने की दिशा उद्घाटित कर सकता है।

जब लड़की इश्क में डूबी होती है, तब वह क्या सोच रही है या बोल रही है, इसका उसे भान नहीं होता और इश्क में डूबे हुए लड़के को न कुछ साफ दिखाई देता है और नहीं ही सुनाई देता है।

वर्तमान को तो गुजर ही जाना है। अत: न तो खुशी से पागल हों और न गम से हताश हों। बल्कि ध्यान रहे, समय को तो बदलना ही है।

दूसरों को जानने वाला विद्वान और स्वयं को जानने वाला ज्ञानी है।

जब भगवान इंसान से घृणा नहीं करते तो फिर हमें क्या अधिकार है कि हम दूसरों से नफरत करें।

यदि किसी से अपना सम्मान करवाना है तो पहले दूसरों का सम्मान करना सीखें।

अपने लिए रास्ता तो सभी बनातें हैं, परन्तु इंसान तो वह महान है जो दूसरों के लिए रास्ता बनाता है।

सही मायने में हमारे दिमाग में हजारों अच्छे विचार आते है, लेकिन उन्हें आजमाने के लिए हमें पहले उन पर गहराई से विचार करना चाहिए।

कामयाबी इस बात से तय होती है कि आप अपने मकसद को पूरा करने के लिए किस हद तक आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।

स्वाभिमान की कीमत पर कोई सम्मान या कोई उपाधि लेना बुद्धिमानी नहीं है, अपना सम्मान खुद करना सीखें।

Monday, 10 February 2014

विचार-श्रंखला : फरवरी-I, 2014

जो व्यक्ति परिवर्तन का जोखिम लेने से इनकार कर देता है, वह आगे बढने में असफल हो जाता है।

नियमित अभ्यास और समर्पण किसी भी चीज के लिए बहुत जरूरी है।

कहा जाता है कि ईश्‍वर भक्त के लिए हर चीज सुलभ रहती है, इसलिए उसे लोभ से दूर ही रहना चाहिए।

शांति हासिल करने के लिए शुरुआती कदम यह है कि अपनी शारीरिक प्रतिक्रियाओं को अनुशासित कर लें।

पद के अहंकार में अपने दायित्व को भूल जाने वाले व्यक्ति को जीवन में कष्ट उठाने पड़ते हैं।

विलासिता निर्बलाता और चाटुकारिता के वातावरण में न तो संस्द्भति का उद्भव होता है और न ही विकास।

यदि मनुष्य परिश्रम न कर और हाथ पर हाथ धरे रखकर केवल मशीनों पर निर्भर रहे तो वह कभी स्वस्थ नहीं रह सकता।

ईमानदारी वह गोंद है, जो हमारे जीने के तरीके को जोड़े रखती है। हमें अपनी ईमानदारी बरकरार रखने के लिए लगातार कोशिश करनी चाहिए।

जो धैर्यवान है और मेहनत से नहीं घबराता, सफलता उसकी दासी है।

Monday, 23 December 2013

विचार-श्रंखला : दिसंबर -II, 2013

प्यार चेहरे की पहचान का मोहताज नहीं होता और न ही उसे बदले में प्यार चाहिए होता है। सच्चा प्यार कुछ मिलने की उम्मीद के बगैर सिर्फ देना जानता है।

नारी की करुणा अंतरजगत का उच्चतम विकास है, जिसके बल पर समस्त सदाचार ठहरे हुए हैं।

श्रद्धा मन में छिपी विस्मयकारी शक्ति को जगाती है, जिससे जीवन के सब कष्टों का निवारण सम्भव है।

विफल होने पर भी हिम्मत रखें और अपना काम निष्ठा से करते हुए अच्छे समय का इंतजार करें।

जो बच्चों को सिखाते हैं, उन पर बड़े अमल करें तो यह संसार स्वर्ग बन जाए। आचार्य जो काम आप कर रहे हैं, अगर उसमें विश्‍वास नहीं है, समर्पण नहीं है तो सफलता नहीं पाई जा सकती।

सिंकदर को ख्याल आया कि पौरुष, पराक्रम व साहस का मार्ग उसे एक ग्रंथ से मिला था, इसीलिए उसने उसे स्वर्णजड़ित पेटी में रखने का विचार किया।

आनंद हमारे अपने घर में ही होता है, उसे दूसरों के बगीचों में ढूंढ़ना बेकार है।

लक्ष्मी उन्हीं की सहायता करती है, जिसका निर्णय विवेकशील होता है।

Tuesday, 19 November 2013

विचार-श्रंखला : नवम्बर-II, 2013

जिस कथन को आचरण में न उतारा जाए, उसमें शक्ति नहीं होती।

हम चिंतन करें और हर समस्या को उसके सही नजरिए से देखें तो हल निकल आएगा।

जो व्यक्ति अपना काम पूजा की तरह करते हैं, उन्हें समय कभी लम्बा और उबाऊ नहीं लगता।

जीवन का ध्येय तभी है, जब वह किसी महान ध्येय के लिए समर्पित हो, यह समर्पण न्यायमुक्त होना चाहिए।

थकने वाला थका ही रहता है और न थकने वाला कहीं का कहीं पहुंच जाता है।

अपने स्वरूप का ज्ञान करने के लिए भी एक ईश्‍वर रूपी गुरु की जरूरत होती है।

पुस्तकों का मूल्य रत्नों से भी अधिक है, क्योंकि वे अन्त:करण को उज्जवल करती है।

सभी को अपनी स्वतंत्रता प्रिय है, लेकिन इसे कायम रखने के लिए भय का सहारा नहीं लिया जा सकता।

यदि आदमी विपरीत परिस्थितियों में भी आपा नहीं खोता है, तो ऐसी स्थिति उसके लिए स्वर्ग जैसी है।

मनुष्य क्रोध को प्रेम से, पाप को सदाचार से, लोभ को दान से और झूठ को सत्य से जीत सकता है।

कभी भी वह काम न करें, जो दूसरे कर रहे थे और इसीलिए आप भी करने लगे। अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय रखें।

Thursday, 10 October 2013

विचार-श्रंखला : अक्तूबर-I, 2013

किसी की भूल बताते समय अपने दृष्टिकोण को उदार बनाकर उसकी गलतियों का उल्लेख करेंगे, तो वह अपनी गलती नहीं दोहराएगा।

जो बोलता है वह फसल बोता है, जो सुनता है वह फसल काटता है।

जीवन में वही व्यक्ति उन्नति कर पाता है, जो स्वयं अपने को उपदेश देता है।

इच्छा होने पर और उसकी पूर्ति न होने पर अभाव खलता है, यहीं से जीवन में दुःख शुरू हो जाता है।

कवि अपने स्वर और चित्रकार अपनी रेखा में जीवन तत्व और सौंदर्य का रंग भरता है।

विद्या और गुण तो हमेशा से व्यक्तित्व के आभूषण माने गए हैं, लेकिन आज के युग में इन दोनों के अलावा चतुुराई भी जरूरी है।

आस्था हर एक के लिए जरूरी है, फिर चाहे वह किसी के भी प्रति क्यांे न हो।

ईर्ष्या मनुष्य को वैसे ही खा जाती है, जैसे कपड़े को कीड़ा।

सही क्षण को पहचान कर उसके अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता ही सच्चे लीडर की पहचान हैं।

विनम्रता विरोधियों को भी अपना बना लेती है।

हम अपनी प्रतिभा और विनम्रता से अपने विरोधियों या अपने ऊपर क्रोध करने वालों को हमेशा के लिए अपना बना सकते हैं।

सभी संगठनों में गपशप करने वाले लोग होते हैं। ये उन कामों की आलोचना करते हैं, जिन पर सकारात्मक चिंतक मेहनत से जुटे रहते हैं।

व्यक्ति जितना स्वयं के द्वारा छला जाता है, उतना दूसरों के द्वारा नहीं।

सच्चे साहित्य का निर्माण एकांत चिंतन और एकांत साधना में होता है।

Thursday, 19 September 2013

विचार-श्रंखला : सितम्बर-II, 2013

परित्याग बहुत मुश्किल है, फिर भी क्रोध को त्यागने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।

इंसान को प्रतिदिन शांत चित्त रहना चाहिए और चेहरे पर मुस्कुराहट रहनी चाहिए।

किसी भी उपदेश को मान लेना अलग बात है और उस पर अमल करना दूसरी बात है।

करुणा में इतनी शीतलता है, जो क्रूर व्यक्ति को भी द्रवित कर दे।

वही सच्चा साहसी है जो कभी निराश नहीं होता।

क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार में से कोई भी दुर्गुण मनुष्य के पतन का कारण हो सकता है।

केवल मनुष्य के मन में ही मृत्यु-बोध उभरता है। मैं मरूंगा-ऐसा ख्याल किसी पशु पक्षी या पेड़ पौधे को नहीं आता।

लोभी व्यक्ति सारा संसार प्राप्त कर लेने पर भी भूखा रहता है।

प्रशंसा सुनना मानवीय स्वभाव है, हर आदमी चाहता है कि उसकी सराहना हो, हमें इसका ध्यान रखना चाहिए।

विपरीत स्थितियों में भी यदि आदमी शांत रहना सीख लेगा, तो उसके जीवन में कोई परेशानी नहीं आएगी।

जीवन का सुख दूसरों को सुखी करने में है, उनको लूटने में नहीं।

परिस्थितियां कितनी भी बुरी प्रतीत हों, हमारे पास, खुशहला जिन्दगी के लिए काफी कुछ बचा रहता है।

प्यार से बोला हुआ एक शब्द अनेकों दुखी हृदयों को सांत्वना देता है।
सुन्दरता भगवान की देन है, लेकिन अपनी वाणी को सुन्दर बनाना आप पर ही निर्भर करता है।

सदा विश्‍वास रखना और हताश न होना ही सफलता का मूल है।

उपकार करके कहना, उसे दूसरों से कहना उपद्भत व्यक्ति से दुश्मनी करने के समान है।

हमें यह ध्यान देना चाहिए कि जिस प्रकार हम अपने विचारों पर दृढ रहते हैं, उसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी अपने विचारों पर दृढ हो सकते हैं।

Sunday, 8 September 2013

विचार-श्रंखला : सितम्बर-I, 2013

हम अपनी नजर से ही दूसरों को देखते है। जिसमें हमें दूसरों का व्यवहार भी अपने जैसा ही नजर आता है।

हर माता-पिता को अपने बच्चों का पालन पोषण करते समय कुछ मामलों में बेरहमी से पेश आना चाहिए।

पशु न बोलने की वजह से कष्ट उठाता है और मनुष्य बोलने की वजह से।

जीवन का महत्व तभी है, जब वह किसी महान ध्येय के प्रति समर्पित हो, यह समर्पण ज्ञान और न्याययुक्त होना चाहिए।

अच्छे विचार और अच्छे कर्म, मानव जीवन को सार्थक बनाते हैं।

आप जो कुछ हैं या अपने जीवन में देख और पा रहे हैं यह कोई संयोग या इत्तफाक नहीं है। आपका जीवन आपकी ही प्रतिध्वनि है, परावर्तन है। यानी आप जीवन को जो कुछ दोगे, वह आपको वैसा का वैसा ही लौटा देगा।

क्रोध की तीव्रता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक क्षण में क्रोधित होने वाले व्यक्ति के पूरे हाव-भाव बदल जाते हैं।

दैवीय शक्ति के बिना न तो आंखें देख पाती है, न कान सुन सकते हैं और न ही मस्तिष्क सोच पाता है।

धरती के सारे खजाने भी एक खोया हुआ क्षण वापस नहीं ला सकते।

बेलगाम होने में एक आनन्द तो है, लेकिन उसमें बहुत कुछ गंवाना भी पड़ता है और कई बार तो सिवाय पछतावे के कुछ हाथ नहीं लगता, यकीन मानिए, जीवन में अनुशासन का कोई विकल्प नहीं है।

शरीय और आत्मा के सम्बन्ध का पहला बिन्दु जन्म और अंतिम बिन्दु मृत्यु है, इनके बीच की प्रवृत्ति संस्कार है।

अपने आपको कभी किसी से हीन नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ईश्‍वर सभी का बराबर ध्यान रखता है।

खातिरदारी जैसी चीज में मिठास जरूर है, पर उसका ढकोसला करने में न मिठास है और न स्वाद।

जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना मनोबल डिगने नहीं देता है, उसे जीवन में कोई परेशानी नहीं होती।

कष्ट ही प्रेरक शक्ति है, जो मनुष्य को कसौटी पर परखती है और बढाती है।

Tuesday, 6 August 2013

विचार-श्रंखला : अगस्त-I, 2013

जिन्दगी भरपूर जीने के लिए है। इसलिये हमारा पूरा ध्यान खुश रहने पर होना चाहिए, न कि सुविधाएं जुटाने और उनके लिए चिन्ता करते रहने पर।

समस्याएं संसाधनों से नहीं, समझ से हल होती हैं।

धन जीवन के लिए कमाओ, न कि जीवन धन एकत्र करने में गंवाओ।

आज का पुरुषार्थ ही कल का भाग्य बनने वाला है।

मनुष्य इतना बुराई करने से नहीं डरता, जितना बदनामी से डरता है।

जिस समय जिस तरह के व्यवहार की आवश्यकता होती है, तब वैसा ही व्यवहार करना बुद्धिमान मनुष्य की पहचान है।

धन्यवाद शब्द एक सर्वोपति गुण है और जब कभी भी कोई आपका काम करता है, आपको यह उसे जरूर अदा कर देना चाहिए।

प्रशंसा उसे नहीं मिलती, जो उसकी खोज में रहता है।

निर्धनता आलस्य का पुरस्कार है।

यदि कोई हमारी त्रुटियों की तरफ हमारा ध्यान दिलाए तो हमें उन्हें स्वीकार करना चाहिए और उनहें दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।

जब आप खुद को सामने वाले के स्थान पर रखना सीख लेंगे, आपकी समझने की क्षमता बढेंगी और आप अच्छे श्रोता बन जाएंगे।

अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ जीवन में दो सर्वोत्तम वरदान हैं।

अगर आपमें विश्‍वास हो, साहस हो और काम करने की इच्छा हो, तो हर बाधा दूर की जा सकती हैं।

मुश्किलें ही जीवन को गढती हैं।

किसी की अच्छाईयां ढूंढने के बनिस्बत बुराइयां ढूढना कहीं आसान है।

आवश्यकताएं दुर्बल को भी साहसी बना देती हैं।

सूर्य अपने तेज से चमकता है, उधार मांगकर नहीं।

क्रोध मस्तिष्क को बुझा देता है।

धन और पेड़ की छाया समय के साथ-साथ घटते-बढते हैं।

एक बुराई दूसरी को जन्म देती है।

Friday, 19 July 2013

विचार-श्रंखला : जुलाई-II, 2013

विजयी वही होते हैं, जिन्हें अपने जीतने का विश्‍वास होता है।

किसी को भी अपने बल या बुद्धि पर घमण्ड नहीं करना चाकिए, किसी के परामर्श से ही सफलता मिलती है।


अधिक दुख और पतन के बाद ही अधिक उन्नति व हर्ष की बारी आती है।

मूर्खता क्या है, इसकी शुरुआत कहॉं से होती है, इसका बड़ा गहरा रहस्य है। हर व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में इसका अलग-अलग स्तर होता है।

उस दिन को बेकार ही समझो, जिस दिन तुम हंसे नहीं।

चिरस्थायी एकता वहीं सम्भव है, जहां अंत:करण एक हो।

बड़े सरकारी अधिकारियों के दोनों हाथों मे लड्डू होता है, वही खाते हैं और वही परोसते हैं।

कम्प्यूटर की तरह ही हमारा मस्तिष्क भी एक आज्ञाकारी सेवक है। उसे इस बात की परवाह नहीं होती कि हम उसे किस तरह के निर्देश दे रहे हैं।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पैसा बहुत महत्वपूर्ण चीज है। लेकिन चिन्ता की बात यह है कि हम पैसे को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण समझने लगे हैं।

अपनी योग्यता का, अपने धन का दूसरों के सहयोग के लिए, समाज के उपयोग के लिए लाना ही वास्तविक उपयोगी व्यक्ति होना है।

संसार में केवल पांच प्रतिशत लोग ही अपनी असीमित बुद्धि का 50 प्रतिशत इस्तेमाल कर पातें हैं। अत: तथाकथित मूर्खों की संख्या ज्यादा है। यह अजीब सा तथ्य है कि बुद्धि का कम प्रयोग करने वाले लोग सरल और निर्मल हृदय के होते हैं। शायद बुरा करने के लिए चातुर्य आवश्यक है और चातुर्य आते ही न जाने क्यों मनुष्य बुराई की राह को ज्यादा पसंद करने लगता है। यह जरूरी नहीं है कि हर बुद्धिमान बुराई के रास्ते पर ही जाता है। शेक्सपीयर के नाटकों में दरबारी विदूषक रहा है और अकबर के दरबार में बीरबल की मौजूदगी की बात है।

मन शुद्ध व पवित्र हो तो नरक में भी सुख है और मन यदि शुद्ध न हो तो स्वर्ग में भी सुख नहीं मिल सकता।

 यदि मन ही मैला है, तो तन के कपड़े धोने का कोई फायदा नहीं।

नाकामियों से घबराएं नहीं। ये सिर्फ सामने आने वाली रुकावटें ही हैं, जो आपको मजबूत बनती हैं।

सफलता ही सब कुछ नहीं है और नाकामी अंत नहीं है।

समस्याओं को नश्तर ही तरह प्रयोग करके ही असफलता के नासूर चीरे जा सकते हैं और दर्द की पीड़ा से उबरा जा सकता है।

व्यस्त आदमी के पास आंसू बहाने का समय नहीं होता।

पुस्तकों से विहिन घर खिड़कियों से विहिन भवन के समान है।

कर्मों के फलस्वरूप ही स्वर्ग नर्क की प्राप्ति होती है, किन्तु इनकी प्राप्ति मृत्यु के बाद ही नहीं, जीवित रहते हुए भी हो जाती हैं।

जो मस्तिष्क नकारात्मक बातों से मुक्त होता है वह हमेशा सकारात्मक परिणाम देता है। इसलिए अपने विचारों की सफाई कीजिए।

दुनिया एक खूबसूरत किताब है, मगर जो इसे पढ नहीं सकता, उसके लिए बेकार है।

स्त्रोत : प्रेसपालिका, 16-31 जुलाई, 2013

Saturday, 6 July 2013

विचार-श्रंखला : जून-II, 2013

विलासिता, निर्बलता और चाटुकारिता के वातावरण में न तो संस्कृति का उदभव होता है और न ही विकास का।-काका कालेलकर

अच्छी युक्ति से जीवन में हमें कठिन से कठिन समस्याओं का बहुत आसान समाधान मिल जाता है।

जैसे जल से अग्नि को शान्त किया जाता है, वैसे ही ज्ञान से मन को शान्त रखना चाहिए।-वेदव्यास।

दुश्मनी को हम दुश्मनी से नहीं मिटा सकते, प्रेम ही उसे मिटा सकता है।-आचार्य विनोबा भावे।

विचार का चिराग बुझ जाने से आचार अन्धा हो जाता है।

उपकार मानना या न मानना व्यक्तिगत है, लेकिन इसका आध्यात्मिक अर्थ भी है। किसी के उपकार को न मानना कृतध्नता कहलाता है।

मनुष्य केवल उन्हीं बातों को याद रखता है, जिन्होंने उस पर गम्भीर प्रभाव डाला है, जो उसके लिए महत्वपूर्ण या मार्मिक होती हैं।

सेवा ही वह सीमेंट है जो लोगों को जीवन पर्यंत स्नेह और साहचर्य में जोड़े रख सकती है।

माला फेरने, तिलक लगाने और मन्दिर जाने से धर्म पालन नहीं होता, धर्म का पालन जीवन द्वारा होता है।

अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं, वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते है और अपने श्रम से सींचकर महापुरुष बनाते हैं।

कुंठा का मूल है कि आप बहुत कुछ तुरन्त करना, सीखना और हासिल करना चाहते हैं।

मनुष्य मन की निर्बलता, उसे सफलता से दूर ले जाती है। सफलता के लिए परिश्रम और दृढ़निश्‍चय की आवश्यकता होती हैं।

सकारात्मक सोच के अन्तर्गत एक सही नजरिया बनाएं। मन की खिड़किया खुली रखें, जिससे बाहर की स्थिति पर नजर रहे।

जीवन उपन्यास की तरह है, जिसके हर पृष्ठ पर कुछ नया इंतजार कर रहा होता है।

स्त्रोत : प्रेसपालिका, 01-16 जून, 2013

Saturday, 4 May 2013

विचार-श्रंखला : मई-I, 2013

  1. राजा और हाथी से सावधान रहो, हाथी चलते-चलते और राजा हंसते-हंसते ही मारता है।
  2. अपनी प्रशंसा चाहने वाले लोगों से दूर रहो, उन्हें सुझाव भी मत दो।
  3. शक्तिशाली से डरना नहीं चाहिये, बल्कि उससे मुकाबला करने के लिये साहस इकट्ठा करना चाहिये।
  4. कही जा रही बातों को संक्षेप में नोट करें।
  5. निन्दा करने से बचने का एक ही तरीका है कि त्रुटियां ढूंढना छोड़ दो।
  6. ज्यादातार लोग गलत जगह पर गलत काम करते हैं और असफलता हाथ लगने पर भाग्य को कोसते रहते हैं।
  7. मानवता के नाते हम सभी का दायित्व है कि हम जहॉं कहीं भी पीड़ित व दीन-दुखियों को देखें तो उनकी यथोचित सहायता करें।
  8. जो व्यक्ति वाणी से ईमानदार नहीं, वह किसी भी काम में ईमानदार नहीं हो सकता।
  9. अगर समय रहते कदम उठाये जाएं तो किसी भी सम्भावित बड़ी दुर्घटना से बचा जा सकता है।
  10. आप जितना अपनी चेतना से अपरिचित रहेंगे, उतनी ही आप में जीवटता की कमी होगी।
  11. जीवन में आगे बढने के लिये जरूरी है कि छोटी-छोटी बातों की ओर ध्यान दिये बगैर बड़ा सोचें और इन बातों का बुरा न मानें।
  12. कभी-कभी व्यक्ति अपने अहंकार एवं विद्वता के मद में चूर होकर यह भूल जाता है कि ज्ञान अनन्त है और उसकी पूर्णता की कोई सीमा नहीं है।
  13. अच्छे संकल्प करो, ताकि अच्छे मार्ग पर चलना सम्भव हो सके।
  14. कुछ लोग किसी की थोड़ी सी मदद करके बार-बार उसका अहसास दिलाते रहते हैं। इससे उनके अहंकार को तो सन्तुष्टि मिल जाती है, लेकिन ऐसे में की गयी मदद की महत्ता घट जाती है। ऐसे लोगों से मदद प्राप्त करना आत्महत्या करने के समान है।
  15. यदि अतीत को ही याद करते रहेंगे तो वर्तमान में जीना कठिन लगेगा और भविष्य अत्यन्त ही मुश्किल प्रतीत होगा।
  16. स्त्रोत : प्रेसपालिका, 01-16 मई, 2013

Tuesday, 23 April 2013

विचार-श्रंखला : अप्रेल-I, 2013

जिसके पास उम्मीद है, वह लाख बार हारकर भी नहीं हारता।

अगर आम मोहक व्यक्तित्व वाले और लोगों के आकर्षण का केन्द्र होना चाहते हैं तो आपको अच्छा वक्ता होना चाहिए। अपनी सम्प्रेषण कला से कोई व्यक्ति सीधी बात को भी बहुत रोचक बना सकता है। बोलने की यह कला आपमें जन्मजात हो, जरूरी नहीं। इसे कोशिश से पाया जा सकता है।

दूसरों को सुनना भी जरूरी है, जिसके लिये जरूरी है कि-दूसरों की बातों को ध्यान से सुनना। वाक्य खत्म होने से पहले नहीं बोल पड़ना। सवालों के जवाब में उल्टे सवाल नहीं करना। पूर्वाग्रह हर किसी में होते हैं, लेकिनउन्हें समझना और उन पर नियन्त्रण रखना जरूरी है। जब दूसरे बोल रहे हों तो उन्हें सुने न कि अपने ही विचारों में खोये रहें। जब एक व्यक्ति बोल चुके तब ही अपने जवाब के बारे में सोचना चाहिये, बीच में नहीं। मुद्दे की बात करें, न कि अपनी अभिरुचि की बात करें।

संस्थानों को अपने पुराने कर्मचारियों या सदस्यों के सम्पर्क में रहना चाहिए और जरूरत पड़ने पर उनके अनुभव का लाभ भी उठाना चाहिए।

स्त्रोत : प्रेसपालिका, 16-30 अप्रेल, 2013

Thursday, 3 January 2013

विचार-श्रंखला : जनवरी, 13-01

विचार-श्रंखला : जनवरी, 13-01

आप जो कुछ भी कहते हैं, वह आपके खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा, किसी बहस के दौरान। चाहे वह बहस 10 महीने बाद ही क्यों न हो रही हो। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं एक महिला हूं। और, हम कभी कुछ नहीं भूलते। कभी भी नहीं।-पत्नी, पति से!

आपको कभी पता नहीं चलता कि आपके पास क्या है, जब तक कि वह आपसे दूर न हो जाए।

जब आप किसी को हकीकत में प्यार करेंगे तब उम्र, दूरी, कद, वजन सिर्फ एक बुरा अंक बनकर रह जाएगा...!

जब भरोसा टूटता है तो माफी के कोई मायने नहीं होते।

हमारी जिन्दगी में तीन तरह के दोस्त होते हैं: 1) जो किसी खास वजह से दोस्त होते हैं, 2) जो किसी खास वक्त (दौर) के लिए दोस्त होते है और, 3) दोस्त जो जीवन भर के लिए होते हैं।

कोई अगर आपसे नफरत करता है तो उसकी तीन में से कोई एक वजह होती है। 1) वह आपके जैसा बनना चाहता है। 2) वह खुद से नफरत करता है। 3) वह आपसे खतरा महसूस करता है।

आप (पति) मेरे (पत्नी) साथ जो सबसे बुरा कर सकते हैं, उनमें एक है मेरी (पत्नी) किसी और (स्त्री) से तुलना करना।-स्त्री।

EX- का मतलब- EXperience के लिए शुक्रिया... हमारा वक़्त EXpire हो चुका है... अब मेरी ज़िन्दगी से EXit करो।

हमें कभी-कभी सलाह की जरूरत नहीं होती। हमें बस कोई चाहिए होता है जो हमें सुने।

दुनिया में सबसे अच्छी फीलिंग वह होती है जब कोई भयानक सपना देखते हुए आपकी नींद टूटती है और आपको एहसास होता है कि वैसा कुछ दरअसल हुआ नहीं था।

आपको जो कुछ चाहिए उसके लिए अगर आप लड़ते नहीं हैं तो जो कुछ आप गंवाते हैं उसके लिए रोइए भी मत।

Saturday, 22 December 2012

विचार-श्रंखला : 3

आप दर्पण में अपना चेहरा देख सकते हैं, लेकिन अपने कर्म में आप अपनी आत्मा को देख सकते हैं।-जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

चाहे सूखी रोटी ही क्यों न हो, अपने श्रम से अर्जित भोजन से मधुर और श्रेष्ठ कुछ नहीं होता।-तिरुवल्लुवर

पुरुष भय और हिंसक तरीकों के जरिये महिलाओं पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं।-हर्ष मंदर, डायरेक्टर सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज

Monday, 14 May 2012

विचार-श्रंखला : 2

अज्ञानता और विचारहीनता मानवता के विनाश के दो सबसे बड़े  कारण हैं!-जोन टिलोटसन

श्रष्टि के अनेक नियमों में से एक यह भी है कि जैसी हम आशंका करते हैं, वैसा हो गुजरता है!

अगर आप इन्द्रधनुष चाहते हैं तो आपको वर्षा का सामना तो करना ही होगा!-डॉली पार्टल

अपने मस्तिष्क को उच्च विचारों और आदर्शों से भर लो, उन्हीं से महान कार्यों का जन्म होगा!-स्वामी विवेकानंद

हम अगर किसी चीज की कल्पना कर सकते हैं, तो उसे साकार भी कर सकते हैं!-नेपोलियन

किसी भी कार्य को खूब सूरती से करने के लिए, हमें उसे स्वयं करना चाहिए!-नेपोलियन

हमारे जीवन का अंत उस दिन से होना शुरू हो जाता है, जिस दिन से हम उन विषयों के बारे में चुप रहना शुरू कर देते हैं, जो (हमारे लिए) मायने रखती हैं!-मार्टिन लूथर किंग, जूनियर

सब्र जिन्दगी के मकसद का दरवाजा खोलता है, क्योंकि सिवाय सब्र के उस दरवाजे की कोई कुंजी नहीं है!-शेख शादी

जिसने ईमानदारी खो दी, उसके पास खोने के लिए और कुछ नहीं बचता!-जोन लाइडी

आशा और आत्मविश्वास से हमारी भीतरी शक्तियां जागृत होती हैं! इससे ही कार्यक्षमता दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है!-स्वेट मार्डेन

नियमों का विधान मनुष्य के लिए किया गया है, मनुष्य का निर्माण नियमों के लिए नहीं हुआ है।-स्वामी रामतीर्थ

किसी चीज की लालसा करने से पूर्व देख लें कि जिसके पास वह चीज है, पहले से है, वे उस चीज से कितने सुखी हैं।-फ्रेंकोइस डे

नीति के विरुद्ध कोई काम करने का फल अपने तक ही नहीं रहता, दूसरों पर उसका और भी बुरा असर पड़ता है।-प्रेमचंद

इरादे आपको भविष्य में धकेलते हैं, परन्तु आनंद हमेशा वर्तमान में है।-श्री श्री रविशंकर

मूर्ख व्यक्ति की सम्रद्धता से समझदार व्यक्ति का दुर्भाग्य कहीं अधिक अच्छा होता है।-एपिक्यूरस

उससे शादी न करें जिसके साथ आप जी सकते हैं, बल्कि उससे करें, जिसके बगैर आप जी नहीं सकते।-जेम्स डोबसन

संगीत के धारे में इंसान ऐसा बह जाता है कि खुद पर नियंत्रण ही नहीं रह पाता है।-राजकुमार केसवानी फिल्म समीक्षक

‘एक सफल विवाह से प्यारा दोस्ताना और अच्छा रिश्ता और कोई नहीं हो सकता..’ मार्टिन लूथर की यह बात सोलह आने सही है। किंतु आधुनिक जीवन में सफल विवाह के कुछ सबसे बड़े शत्रु उभरकर सामने आए हैं और उनमें से प्रमुख है—ईगो, दंभ और घमंड। इन तीनों शब्दों के अर्थो में कुछ भेद जरूर है, पर इनकी आत्मा एक है। इनका वार एक सा है, प्रहार एक सा है और इनका असर भी एक सा है। जब तक ये तीनों ज़िन्दगी हैं, सफल विवाह दम तोड़ता नज़र आता है। हम अपनी ईगो के चलते विवाह जैसे खूबसूरत रिश्ते की बलि चढ़ाने में भी नहीं हिचकिचाते। इसके विपरीत अगर ईगो को ही बलि की वेदी पर चढ़ा दिया जाए तो विवाह जैसा संबंध हमारे जीवन में नई रोशनी भर सकता है। ईगो को टक्कर देने के लिए हमारे पास कुछ हथियार हैं और वे हथियार हैं, प्यार और त्याग.. क्योंकि अगर प्यार है तो त्याग है, और त्याग है तो रिश्ता टूट ही नहीं सकता। बल्कि वह अच्छे से फले फूलेगा और मिठासभरा होगा। जहां दंभ है, वहां प्यार नहीं रह सकता, वहां हम एक-दूसरे के साथ नहीं, एक दूसरे से मिलकर नहीं, बल्कि एक दूसरे से अलग होकर जी रहे होते हैं।-माधवी शर्मा गुलेरी, लेखिका।

विवाह किसी भी अफेयर से बड़ा संबंध होता है। हम किसी छोटे-बड़े कारण के चलते अफेयर को ब्रेकअप में बदल सकते हैं, लेकिन उन्हीं कारणों के चलते विवाह को तलाक में बदलने से पहले कई बार सोचते हैं। हर इंसान अपने संबंध को बचाने के लिए जी-जान लगाता है और समय के साथ विवाहित पुरुष-स्त्री जानने लगते हैं कि संबंध इतना कमजोर नहीं होता, जो छोटे छोटे झगड़ों की भेंट चढ़ जाए, लेकिन यह समझने के लिए सहनशीलता चाहिए और वह आती है विवाह के बाद ही।-माधवी शर्मा गुलेरी, लेखिका।

कुछ ऐसा ही प्रेम-संबंध इमरोज ने अमृता प्रीतम के लिए महसूस किया। वह अपने संस्मरण में कहते हैं, ‘कोई भी रिश्ता बांधने से नहीं बंधता। प्रेम का मतलब होता है एक-दूसरे को पूरी तरह जानना, एक-दूसरे के जज्बात की कद्र करना और एक-दूसरे के लिए फना होने का जज्बा रखना। अमृता और मेरे बीच यही रिश्ता रहा। पूरे 41 बरस तक हम साथ साथ रहे। इस दौरान हमारे बीच कभी किसी तरह की कोई तकरार नहीं हुई। यहां तक कि किसी बात को लेकर हम कभी एक-दूसरे से नाराज भी नहीं हुए।’-माधवी शर्मा गुलेरी, लेखिका।

शिष्टाचार के आभाव में सौंदर्य का कोई मूल्य नहीं होता है। क्योंकि शारीरिक सुन्दरता के आभाव में शिष्टाचारी दूसरों का हृदय जीत लेता है।-स्वेट मार्टेन।

अपना जीवन जीने के केवल दो ही तरीके हैं, पहला यह मानना कि कोई चमत्कार नहीं होता है, दूसरा कि हर वस्तु एक चमत्कार है।-अल्बर्ट आइंस्टीन

विश्वास और प्रेम में एक ही समानता है-दोनों में से कोई भी जबरदस्ती पैदा नहीं किया जा सकता!-थोपेन हावर

श्रेष्ठतम  मार्ग खोजने की प्रतीक्षा के बजाय हम गलत रस्ते से बचते रहें और बेहतर रस्ते को अपनाते रहें।-जवाहर लाल नेहरू

धैर्य जीवन के उद्देश्य का दरवाजा खोलता है, क्योंकि सिवाय इसके उस दरवाजे की कोई और कुंजी नहीं है।-खलील जिब्रान

मित्र वे दुर्लभ लोग होते हैं, जो हमारा हालचाल पूछते हैं और जवाब सुनने के लिये रुकते भी हैं।-एड कनिंघम

अगर तुम्हें अपने जीवन से प्रेम है तो समय को व्यर्थ मत गंवाओ, क्योंकि जीवन उसी से बना है।-फ्रैंकलिन

जीवन में सफलता पाने के लिए बेहद जरूरी है कि हर आने वाले अवसर के लिए स्वयं को बेहतर ढंग से तैयार कर लिया जाये।-डिजरायली

बोलो वही, जिसके नीचे हस्ताक्षर कर सको और सोचो वही, जो बेहिचक बोल सको।-मुनिश्री तरुणसागर
विविध स्त्रोतों से संकलित।

Tuesday, 8 November 2011

विचार :

"विवाह वह साहसिक-कार्य है जो कोई बुजदिल पुरुष ही कर सकता है।"

"प्यार अंधा होता है और शादी आँखें खोल देती है।"
"विवाह वह प्रणाली है, जो अकेलापन महसूस किए बिना अकेले जीने की सामर्थ्य प्रदान करती है।"
"सर्कस की तरह विवाह में भी तीन रिंग होते हैं - एंगेजमेंट रिंग, वेडिंग रिंग और सफरिंग।"

"विवाह' और 'विवाद' में केवल एक अक्षर का अन्तर है शायद इसलिए दोनों में इतना भावनात्मक साहचर्य और अपनापन है।"

पत्नी को ख़ुश रखना इस सभ्यता की संभवतः सबसे प्राचीन समस्या है। सभी कालखण्डों में पति अपनी पत्नी को ख़ुश रखने के आधुनिकतम तरीकों का इस्तेमाल करता रहा है और दूसरी ओर पत्नी भी नाराज़ होने की नई-नई तरक़ीबों का ईजाद करती रहती है। एक बार एक कामयाब और संतुष्ट-से दिखाई देनेवाले पति से मैंने पूछा- 'क्यों भाई पत्नी को ख़ुश रखने का उपाय क्या है?' वह नाराज़ होकर बोला- 'यह प्रश्न ही गलत है। यह सवाल यूँ होना चाहिए था कि पत्नी को भी कोई ख़ुश रख सकता है क्या?' उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि "शादी और युद्ध में सिर्फ़ एक अन्तर है कि शादी के बाद आप दुश्मन के बगल में सो सकते हैं।"

शादी : "शादी और प्याज में कोई ख़ास अन्तर नहीं - आनन्द और आँसू साथ-साथ नसीब होते हैं।"

पत्नी-पति के एकांत में संबोधन ऐसे हो सकते हैं जो शायद सार्वजनिक नहीं किए जा सकते हों। हमारे दाम्पत्य में अगर डोर प्रेम, आदर और विश्वास की है तो उससे बने संबोधन भी निश्चित ही सुंदर होंगे।

पति-पत्नी को कोशिश करनी चाहिए कि एकांत में भी एक-दूसरे के लिए उपयोग किए जाने वाले संबोधनों में प्रेम, आदर दोनों झलके। अक्सर पति-पत्नी का एकांत सिर्फ तनाव या वासना इन दो भावों में से किसी एक का केंद्र होकर रह जाता है।

अगर हम एक दूसरे के प्रति एकांत में भी वैसा ही आदर और प्रेम रखें तो रिश्तों में तनाव कभी आ ही नहीं सकता। वरन दाम्पत्य महकने लगता है। हमेशा प्रेम से रहें। जीवन साथी से कठोर लहजे में बात करने से पहले उसकी और खुद की, दोनों की गरिमा का ध्यान रखना जरूरी है।

प्रेम व्यक्ति के जीवन में जब आता है तब उसे बहुत धीरे-धीरे एहसास होता है लेकिन जब जाता है तो अपने पीछे एक खालीपन छोड़ जाता है।

वे पति-पत्नी ही सबसे ज्यादा सुखी रहते हैं जो ना केवल एक-दूसरे को अपना एकांत देते हैं बल्कि कभी-कभी एक-दूसरे की जिम्मेदारियों को भी उठाते हैं। 

पति-पत्नी सिर्फ सहचर ना रहें, जीवन में सहभागी भी बनें। एक-दूसरे के कामों में हाथ बंटाएं, अपने साथी को लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करें, कभी ये भी देखने का प्रयास करें कि आपका साथी किस स्थिति में संघर्ष कर रहा है। पति-पत्नी जब सहचर से, जीवन के सहभागी बन जाते हैं, तो रिश्ते में रोज एक नयापन दिखाई देता है।

हमारा भी पहला कर्तव्य है कि हम अपनी क्षमताओं के अनुसार जिम्मेदारी से अपना काम करें। जहां हम लोक हित में आवाज उठा सकते हैं वहां आगे भी आएं।

सफलता की खुशी मनाना अच्छा है, पर सबसे जरूरी है अपनी असफलता से सीख लेना!-बिल गेट्स

लोगों को सार्वजनिक तौर पर बोलने से पहले दस बार सोच लेना चाहिए और सार्वजनिक जगहों पर बयान देने में सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि लोगों की भावनाएं आहत हो सकती हैं।-सुप्रीम कोर्ट (अग्निवेश के मामले में टिप्पणी)

अगर आप सदा स्वयँ की दूसरो के साथ तुलना करते रहते है तो आप अवश्य ही अहंकार अथवा ईर्ष्या के शिकार हो जाएँगे!

हमारी बातें चाहे कितनी भी श्रेष्ट क्यों न हों, परंतु दुनिया हमें हमारे कर्मों के द्वारा ही पहचानती है!

आप अपने अधिकारों के प्रति ही जागरूक न रहें, अपितु इस बात का भी ध्यान रखें की आप सही मार्ग पर हैं या नहीं!

किसी दूसरे व्यक्ति की आलोचना करने से पहले हमें अपने अंदर झाँक कर देख लेना चाहिए!

कभी-कभी हम दूसरों को बदलने के लिए बाध्य कर देते हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि दूसरे लोग वैसे ही बनें, जैसे कि हम उन्हें चाहते हैं! जो किसी भी द्रष्टि से उचित नहीं है!

अहंकार जीवन में आते ही बुद्धि को उल्टा कर देता है। यहीं से लोग अहंकार और इज्जत को एक समझने लगते हैं और भूल जाते हैं कि अहंकार बढ़ने से इज्जत बढ़ती नहीं, बल्कि घट जाती है।

अहंकारी मनुष्य समाज में प्रतिष्ठा भले ही बना ले, लेकिन उसका मनोबल और आत्मविश्वास कम होने लगता है। 

अहंकार जैसे-जैसे कम होगा, हम सरल और विनम्र होते जाएंगे और यहीं से हम दूसरों से अपेक्षा करना छोड़ देंगे। 

जीवन जितना अपेक्षारहित होगा, उतना ही अशांति से दूर होगा।

अहंकारी सारी दुनिया के सामने अपनी ऊर्जा इस बात में खर्च करता है कि लोग जान जाएं ‘मैं कौन हूं।’ इसे सिद्ध करने के लिए वह हर तरह के हथकंडे अपनाता है। जबकि अध्यात्म कहता है - ताकत इस बात में लगाओ कि आप स्वयं जान जाएं कि आप कौन हैं? 

अपनी खासियत, अपनी विशिष्टता, हम भी कुछ हैं, इस भाव के आसपास जीवन भर ताने-बाने बुने जाते हैं। जब मनुष्य इससे संघर्ष करता है तो अहंकार अपनी विदाई के अंतिम क्षणों में विनम्रता का वेश धर लेता है, पर जाना नहीं चाहता। इसको भेजे बिना जीवन का सच्च सुख नहीं मिल सकता।

दुनिया में बड़ा होना है तो छोटा होना आना चाहिए। छोटा होने का अर्थ है विनम्रता। दुनिया जब भी जीती जाएगी, विनम्रता से जीती जाएगी। बड़ा होकर सिर्फ किसी को हराया ही जा सकता है।

मानवीय सुख हमारे परिवारों की प्राचीन मांग है। अधिकांश लोगों की गृहस्थी की शुरुआत इसी से होती है। देह का भान, उसकी तृप्ति और अतृप्ति ही अशांति का कारण बनती है। कई रिश्ते तो घरों में देह से चलकर देह पर ही खत्म हो जाते हैं। शरीर से परे हो ही नहीं पाता परस्पर आत्म समर्पण। अधिक समय दांपत्य जब शरीर पर ही टिकता है तो त्याग की भावना जन्म नहीं ले पाती।

भोग, उसकी पूर्ति और अपेक्षा के आसपास जीवन मंडराने लगता है। फिर शुरू होता है तनाव। केवल शरीर पर टिके रहकर तनाव का निदान नहीं हो सकता। फिर तनाव अपना वंश बढ़ाता है, तब प्रवेश होता है अशांति का। एक-दूसरे के प्रति शंका होने लगती है।

संदेह एक धीमा जहर है घर-परिवार के लिए। परिवार का हर व्यक्ति फिर अपने-अपने अधिकार में, अपने-अपने अधिकार के लिए ही जीने लगता है। दांपत्य में अपेक्षा, संदेह, देह, अधिकार जैसी वृत्तियों से बचने के लिए एक ही उपाय है और वह है प्रेम।

यह प्रेम न तो दहेज में मिलता है, न डिग्री से प्राप्त होता है, इसे कोई तिजोरी भी नहीं उगल पाती, न किसी दवा की शक्ल में बाजार में उपलब्ध है। इसे अपने भीतर जगाने का एक ही तरीका है अपनी सांसों से अपनी चेतना को जोड़कर थोड़ा भीतर उतरने का अभ्यास रोज करें।

हृदय को जब सांसों से चेतना का पवित्र स्पंदन मिलता है तो आप स्वत: प्रेमपूर्ण हो जाते हैं। योग से योगी ही तैयार नहीं होते, प्रेमपूर्ण व्यक्तित्व भी निर्मित होते हैं, इसीलिए अपने घर में किसी भी सदस्य को दया का पात्र न बनाएं, बल्कि प्रेम का भागीदार बनाएं।

वही परिवार सुखी और समृद्ध हो सकता है जिसका हर सदस्य अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से निभाता है। यह भी संभव है कि परिवार का कोई सदस्य अपने हिस्से की जिम्मेदारी न निभा पाए ऐसे में दूसरों को धैर्य और उदारता से काम लेना चाहिए। परिवार की खुशहाली के लिए हक पाने के लिए लडऩे की बजाय अपने कर्तव्य को निभाने में ही ध्यान रखना चाहिए।

वही परिवार लम्बे समय तक सुख-समृद्धि के साथ फल-फूल सकता है जिसके सदस्यों के बीच अधिकारों व सुविधाओं की छीना-झपटी होने की बजाय कर्तव्यों को पूरा करने का समर्पण भाव होता है। घर-परिवार में माता-पिता या बड़ों के प्रति क्या कर्तव्य होता है।

भूख का अर्थ है जीवन के प्रति एक तीव्र आवश्यकता। गृहस्थी एक भूख है। अगर जीवन में यह भूख नहीं हो तो गृहस्थी के सारे सुख बेस्वाद हो जाएंगे। गृहस्थी की भूख को बढ़ाने में आपसी संतुलन और प्रेम टॉनिक का काम करते हैं। ये भूख तो बढ़ाते ही हैं, स्वाद भी इन्हीं में निहित है।

इन सात बातों से मजबूत होता है पति-पत्नी का रिश्ता

दाम्पत्य कहते किसे हैं? क्या सिर्फ विवाहित होना या पति-पत्नी का साथ रहना दाम्पत्य कहा जा सकता है। पति-पत्नी के बीच का ऐसा धर्म संबंध जो कर्तव्य और पवित्रता पर आधारित हो। इस संबंध की डोर जितनी कोमल होती है, उतनी ही मजबूत भी। जिंदगी की असल सार्थकता को जानने के लिये धर्म-अध्यात्म के मार्ग पर दो साथी, सहचरों का प्रतिज्ञा बद्ध होकर आगे बढऩा ही दाम्पत्य या वैवाहिक जीवन का मकसद होता है। 

यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर स्त्री और पुरुष दोनों ही अधूरे होते हैं। दोनों के मिलन से ही अधूरापन भरता है। दोनों की अपूर्णता जब पूर्णता में बदल जाती है तो अध्यात्म के मार्ग पर बढऩा आसान और आंनद पूर्ण हो जाता है। दाम्पत्य की भव्य इमारत जिन आधारों पर टिकी है वे मुख्य रूप से सात हैं।

संयम : यानि समय-यमय पर उठने वाली मानसिक उत्तेजनाओं जैसे- कामवासना, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मोह आदि पर नियंत्रण रखना।

संतुष्टि : यानि एक दूसरे के साथ रहते हुए समय और परिस्थिति के अनुसार जो भी सुख-सुविधा प्राप्त हो जाए उसी में संतोष करना। दोनों एक दूसरे से पूर्णत: संतुष्ट थे।

संतान : दाम्पत्य जीवन में संतान का भी बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है। पति-पत्नी के बीच के संबंधों को मधुर और मजबूत बनाने में बच्चों की अहम् भूमिका रहती है।

संवेदनशीलता : पति-पत्नी के रूप में एक दूसरे की भावनाओं का समझना और उनकी कद्र करना। दोनों का बिना कहे-सुने ही एक दूसरे के मन की बात समझ जाना।

संकल्प : पति-पत्नी के रूप अपने धर्म संबंध को अच्छी तरह निभाने के लिये अपने कर्तव्य को संकल्पपूर्वक पूरा करना। 

सक्षम : सामर्थ्य का होना। दाम्पत्य यानि कि वैवाहिक जीवन को सफलता और खुशहाली से भरा-पूरा बनाने के लिये पति-पत्नी दोनों को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से मजबूत होना बहुत ही आवश्यक है। 

समर्पण : दाम्पत्य यानि वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी का एक दूसरे के प्रति पूरा समर्पण और त्याग होना भी आवश्यक है। एक-दूसरे की खातिर अपनी कुछ इच्छाओं और आवश्यकताओं को त्याग देना या समझौता कर लेना दाम्पत्य संबंधों को मधुर बनाए रखने के लिये बड़ा ही जरूरी होता है।

अक्सर पति-पत्नी के रिश्ते में तनाव की एक बारीक सी डोर भी होती है। इसमें थोड़ा भी खिंचाव आने पर रिश्ते तन जाते हैं। ज्यादा दबाव दिया जाए तो टूट भी जाते हैं। ये डोर होती है अपेक्षा की। हम एक-दूसरे से जब रिश्ता जोड़ते हैं तो अपनी अपनेक्षाएं भी उसके साथ चिपका देते हैं। रिश्ता कोई भी हो हम उसमें कभी नि:स्वार्थ नहीं रह पाते हैं। हमारा कोई भी रिश्ता निष्काम नहीं होता। 

यह अपेक्षा ही तनाव और बिखराव का कारण बनती है। अपनों से की गई अपेक्षा तो और उपद्रव खड़े करती है। अपनों से अपेक्षा पूरी हो जाए तो शांति नहीं मिलती लेकिन यदि पूरी न हो तो अशांति जरूर ज्यादा हो जाती है। इसीलिए पति-पत्नी और रिश्तेदारों के बीच के संबंध हमेशा खटपट वाले बने रहते हैं क्योंकि हमने इनका आधार अपेक्षा बना लिया है।

हम अपने भीतर पसंद, नापसंद का एक ऐसा आरक्षण कर लेते हैं कि जिसके कारण हम लोगों की अच्छाइयों से वंचित हो जाते हैं। हम जितना दूसरों की अच्छाइयों के निकट जाएंगे उतना ही अपने भीतर शांति पाएंगे।

आपके दाम्पत्य में संतुष्टि का भाव होना चाहिए। जितनी ज्यादा अपेक्षा रखेंगे, उतनी ज्यादा परेशानी और अशांति आपको ही झेलनी पड़ेगी।

अक्सर हम भगवान को सिर्फ दु:ख और परेशानी में ही याद करते हैं। जैसे ही परिस्थितियां हमारे अनुकूल होती हैं, हम भगवान को भूला देते हैं। जीवन में अगर प्रेम का संचार करना है तो उसमें प्रार्थना की उपस्थिति अनिवार्य है। प्रेम में प्रार्थना का भाव शामिल हो जाए तो वह प्रेम अखंड और अजर हो जाता है। 

हम प्रेम के किसी भी रिश्ते में बंधे हों, वहां परमात्मा की प्रार्थना के बिना भावनाओं में प्रभाव उत्पन्न करना संभव नहीं है। इसलिए परमात्मा की प्रार्थना और अपने भीतरी प्रेम को एक कीजिए। जब दोनों एक हो जाएंगे तो हर रिश्ते में प्रेम की मधुर महक को आप महसूस कर सकेंगे।

समझदार इंसान को मालुम होना चाहिए कि वह कितना योग्य है और वह क्या-क्या कुशलता के साथ कर सकता है। जिन कार्यों में हमें महारत हासिल हो वहीं कार्य हमें सफलता दिला सकते हैं।

राजा : आचार्य चाणक्य कहते हैं कि वैसे तो किसी भी राजा के अधीन उसकी सेना, मंत्री और अन्य राजा रहते हैं लेकिन उसका स्वयं का ताकतवर होना भी जरूरी है। यदि कोई राजा स्वयं शक्तिहीन है तो वह किसी पर राज नहीं कर सकता। राजा जितना शक्तिशाली होगा उतना ही अच्छा शासक रहता है। इसीलिए यह जरूरी है कि राजा का बाहुबल से भी शक्तिशाली हो।]

स्त्री : आचार्य चाणक्य कहते हैं किसी भी स्त्री का सौंदर्य और यौवन ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है। यदि कोई स्त्री सुंदर नहीं है लेकिन मधुर व्यवहार वाली है तब भी वह जीवन में कभी भी परेशानियों का सामना नहीं करती है। मधुर व्यवहार से ही स्त्री मान-सम्मान प्राप्त करती हैं।

पत्नी : आचार्य चाणक्य कहते हैं, यदि किसी व्यक्ति की पत्नी हमेशा क्रोध में रहती है, पति को प्रेम नहीं करती है, पतिव्रत धर्म का पालन नहीं कर रही है, हमेशा पति को दुख देती रहती है तो ऐसी पत्नी को तुरंत त्याग देना चाहिए। जो रिश्तेदार, भाई-बहन दुख के समय साथ छोड़ देते हैं उनसे दूर रहने में ही भलाई है। जहां प्रेम का अभाव वहां कोई रिश्ता नहीं रखना चाहिए।

साथ : कभी-कभी रिश्तेदार और मित्र भी आपके बुरे समय में साथ छोड़ देते हैं, ठीक उसी समय पत्नी का साथ व्यक्ति को बड़ी से बड़ी मुश्किल से भी निकाल सकता है। विपरित परिस्थितियों में जिस व्यक्ति की पत्नी भी साथ छोड़ दे तो उसका जीवन निश्चित ही नरक के समान हो जाएगा।
जीवन का निर्माण : समय को नष्ट मत करो, क्योंकि यही वह चीज है, जिससे जीवन का निर्माण हुआ है!-बेनाजमिन फ्रेंकलिन!
आशावादी : आशावादी को हर खतरे में अवसर दीखता है और निराशावादी को हर अवसर में खतरा दीखता है!-विंस्टन चर्चिल!

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