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Monday, 23 December 2013

विचार-श्रंखला : दिसंबर -II, 2013

प्यार चेहरे की पहचान का मोहताज नहीं होता और न ही उसे बदले में प्यार चाहिए होता है। सच्चा प्यार कुछ मिलने की उम्मीद के बगैर सिर्फ देना जानता है।

नारी की करुणा अंतरजगत का उच्चतम विकास है, जिसके बल पर समस्त सदाचार ठहरे हुए हैं।

श्रद्धा मन में छिपी विस्मयकारी शक्ति को जगाती है, जिससे जीवन के सब कष्टों का निवारण सम्भव है।

विफल होने पर भी हिम्मत रखें और अपना काम निष्ठा से करते हुए अच्छे समय का इंतजार करें।

जो बच्चों को सिखाते हैं, उन पर बड़े अमल करें तो यह संसार स्वर्ग बन जाए। आचार्य जो काम आप कर रहे हैं, अगर उसमें विश्‍वास नहीं है, समर्पण नहीं है तो सफलता नहीं पाई जा सकती।

सिंकदर को ख्याल आया कि पौरुष, पराक्रम व साहस का मार्ग उसे एक ग्रंथ से मिला था, इसीलिए उसने उसे स्वर्णजड़ित पेटी में रखने का विचार किया।

आनंद हमारे अपने घर में ही होता है, उसे दूसरों के बगीचों में ढूंढ़ना बेकार है।

लक्ष्मी उन्हीं की सहायता करती है, जिसका निर्णय विवेकशील होता है।

Tuesday, 19 November 2013

विचार-श्रंखला : नवम्बर-II, 2013

जिस कथन को आचरण में न उतारा जाए, उसमें शक्ति नहीं होती।

हम चिंतन करें और हर समस्या को उसके सही नजरिए से देखें तो हल निकल आएगा।

जो व्यक्ति अपना काम पूजा की तरह करते हैं, उन्हें समय कभी लम्बा और उबाऊ नहीं लगता।

जीवन का ध्येय तभी है, जब वह किसी महान ध्येय के लिए समर्पित हो, यह समर्पण न्यायमुक्त होना चाहिए।

थकने वाला थका ही रहता है और न थकने वाला कहीं का कहीं पहुंच जाता है।

अपने स्वरूप का ज्ञान करने के लिए भी एक ईश्‍वर रूपी गुरु की जरूरत होती है।

पुस्तकों का मूल्य रत्नों से भी अधिक है, क्योंकि वे अन्त:करण को उज्जवल करती है।

सभी को अपनी स्वतंत्रता प्रिय है, लेकिन इसे कायम रखने के लिए भय का सहारा नहीं लिया जा सकता।

यदि आदमी विपरीत परिस्थितियों में भी आपा नहीं खोता है, तो ऐसी स्थिति उसके लिए स्वर्ग जैसी है।

मनुष्य क्रोध को प्रेम से, पाप को सदाचार से, लोभ को दान से और झूठ को सत्य से जीत सकता है।

कभी भी वह काम न करें, जो दूसरे कर रहे थे और इसीलिए आप भी करने लगे। अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय रखें।

Thursday, 10 October 2013

विचार-श्रंखला : अक्तूबर-I, 2013

किसी की भूल बताते समय अपने दृष्टिकोण को उदार बनाकर उसकी गलतियों का उल्लेख करेंगे, तो वह अपनी गलती नहीं दोहराएगा।

जो बोलता है वह फसल बोता है, जो सुनता है वह फसल काटता है।

जीवन में वही व्यक्ति उन्नति कर पाता है, जो स्वयं अपने को उपदेश देता है।

इच्छा होने पर और उसकी पूर्ति न होने पर अभाव खलता है, यहीं से जीवन में दुःख शुरू हो जाता है।

कवि अपने स्वर और चित्रकार अपनी रेखा में जीवन तत्व और सौंदर्य का रंग भरता है।

विद्या और गुण तो हमेशा से व्यक्तित्व के आभूषण माने गए हैं, लेकिन आज के युग में इन दोनों के अलावा चतुुराई भी जरूरी है।

आस्था हर एक के लिए जरूरी है, फिर चाहे वह किसी के भी प्रति क्यांे न हो।

ईर्ष्या मनुष्य को वैसे ही खा जाती है, जैसे कपड़े को कीड़ा।

सही क्षण को पहचान कर उसके अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता ही सच्चे लीडर की पहचान हैं।

विनम्रता विरोधियों को भी अपना बना लेती है।

हम अपनी प्रतिभा और विनम्रता से अपने विरोधियों या अपने ऊपर क्रोध करने वालों को हमेशा के लिए अपना बना सकते हैं।

सभी संगठनों में गपशप करने वाले लोग होते हैं। ये उन कामों की आलोचना करते हैं, जिन पर सकारात्मक चिंतक मेहनत से जुटे रहते हैं।

व्यक्ति जितना स्वयं के द्वारा छला जाता है, उतना दूसरों के द्वारा नहीं।

सच्चे साहित्य का निर्माण एकांत चिंतन और एकांत साधना में होता है।

Thursday, 19 September 2013

विचार-श्रंखला : सितम्बर-II, 2013

परित्याग बहुत मुश्किल है, फिर भी क्रोध को त्यागने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।

इंसान को प्रतिदिन शांत चित्त रहना चाहिए और चेहरे पर मुस्कुराहट रहनी चाहिए।

किसी भी उपदेश को मान लेना अलग बात है और उस पर अमल करना दूसरी बात है।

करुणा में इतनी शीतलता है, जो क्रूर व्यक्ति को भी द्रवित कर दे।

वही सच्चा साहसी है जो कभी निराश नहीं होता।

क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार में से कोई भी दुर्गुण मनुष्य के पतन का कारण हो सकता है।

केवल मनुष्य के मन में ही मृत्यु-बोध उभरता है। मैं मरूंगा-ऐसा ख्याल किसी पशु पक्षी या पेड़ पौधे को नहीं आता।

लोभी व्यक्ति सारा संसार प्राप्त कर लेने पर भी भूखा रहता है।

प्रशंसा सुनना मानवीय स्वभाव है, हर आदमी चाहता है कि उसकी सराहना हो, हमें इसका ध्यान रखना चाहिए।

विपरीत स्थितियों में भी यदि आदमी शांत रहना सीख लेगा, तो उसके जीवन में कोई परेशानी नहीं आएगी।

जीवन का सुख दूसरों को सुखी करने में है, उनको लूटने में नहीं।

परिस्थितियां कितनी भी बुरी प्रतीत हों, हमारे पास, खुशहला जिन्दगी के लिए काफी कुछ बचा रहता है।

प्यार से बोला हुआ एक शब्द अनेकों दुखी हृदयों को सांत्वना देता है।
सुन्दरता भगवान की देन है, लेकिन अपनी वाणी को सुन्दर बनाना आप पर ही निर्भर करता है।

सदा विश्‍वास रखना और हताश न होना ही सफलता का मूल है।

उपकार करके कहना, उसे दूसरों से कहना उपद्भत व्यक्ति से दुश्मनी करने के समान है।

हमें यह ध्यान देना चाहिए कि जिस प्रकार हम अपने विचारों पर दृढ रहते हैं, उसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी अपने विचारों पर दृढ हो सकते हैं।

Sunday, 8 September 2013

विचार-श्रंखला : सितम्बर-I, 2013

हम अपनी नजर से ही दूसरों को देखते है। जिसमें हमें दूसरों का व्यवहार भी अपने जैसा ही नजर आता है।

हर माता-पिता को अपने बच्चों का पालन पोषण करते समय कुछ मामलों में बेरहमी से पेश आना चाहिए।

पशु न बोलने की वजह से कष्ट उठाता है और मनुष्य बोलने की वजह से।

जीवन का महत्व तभी है, जब वह किसी महान ध्येय के प्रति समर्पित हो, यह समर्पण ज्ञान और न्याययुक्त होना चाहिए।

अच्छे विचार और अच्छे कर्म, मानव जीवन को सार्थक बनाते हैं।

आप जो कुछ हैं या अपने जीवन में देख और पा रहे हैं यह कोई संयोग या इत्तफाक नहीं है। आपका जीवन आपकी ही प्रतिध्वनि है, परावर्तन है। यानी आप जीवन को जो कुछ दोगे, वह आपको वैसा का वैसा ही लौटा देगा।

क्रोध की तीव्रता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक क्षण में क्रोधित होने वाले व्यक्ति के पूरे हाव-भाव बदल जाते हैं।

दैवीय शक्ति के बिना न तो आंखें देख पाती है, न कान सुन सकते हैं और न ही मस्तिष्क सोच पाता है।

धरती के सारे खजाने भी एक खोया हुआ क्षण वापस नहीं ला सकते।

बेलगाम होने में एक आनन्द तो है, लेकिन उसमें बहुत कुछ गंवाना भी पड़ता है और कई बार तो सिवाय पछतावे के कुछ हाथ नहीं लगता, यकीन मानिए, जीवन में अनुशासन का कोई विकल्प नहीं है।

शरीय और आत्मा के सम्बन्ध का पहला बिन्दु जन्म और अंतिम बिन्दु मृत्यु है, इनके बीच की प्रवृत्ति संस्कार है।

अपने आपको कभी किसी से हीन नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ईश्‍वर सभी का बराबर ध्यान रखता है।

खातिरदारी जैसी चीज में मिठास जरूर है, पर उसका ढकोसला करने में न मिठास है और न स्वाद।

जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना मनोबल डिगने नहीं देता है, उसे जीवन में कोई परेशानी नहीं होती।

कष्ट ही प्रेरक शक्ति है, जो मनुष्य को कसौटी पर परखती है और बढाती है।

Tuesday, 6 August 2013

विचार-श्रंखला : अगस्त-I, 2013

जिन्दगी भरपूर जीने के लिए है। इसलिये हमारा पूरा ध्यान खुश रहने पर होना चाहिए, न कि सुविधाएं जुटाने और उनके लिए चिन्ता करते रहने पर।

समस्याएं संसाधनों से नहीं, समझ से हल होती हैं।

धन जीवन के लिए कमाओ, न कि जीवन धन एकत्र करने में गंवाओ।

आज का पुरुषार्थ ही कल का भाग्य बनने वाला है।

मनुष्य इतना बुराई करने से नहीं डरता, जितना बदनामी से डरता है।

जिस समय जिस तरह के व्यवहार की आवश्यकता होती है, तब वैसा ही व्यवहार करना बुद्धिमान मनुष्य की पहचान है।

धन्यवाद शब्द एक सर्वोपति गुण है और जब कभी भी कोई आपका काम करता है, आपको यह उसे जरूर अदा कर देना चाहिए।

प्रशंसा उसे नहीं मिलती, जो उसकी खोज में रहता है।

निर्धनता आलस्य का पुरस्कार है।

यदि कोई हमारी त्रुटियों की तरफ हमारा ध्यान दिलाए तो हमें उन्हें स्वीकार करना चाहिए और उनहें दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।

जब आप खुद को सामने वाले के स्थान पर रखना सीख लेंगे, आपकी समझने की क्षमता बढेंगी और आप अच्छे श्रोता बन जाएंगे।

अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ जीवन में दो सर्वोत्तम वरदान हैं।

अगर आपमें विश्‍वास हो, साहस हो और काम करने की इच्छा हो, तो हर बाधा दूर की जा सकती हैं।

मुश्किलें ही जीवन को गढती हैं।

किसी की अच्छाईयां ढूंढने के बनिस्बत बुराइयां ढूढना कहीं आसान है।

आवश्यकताएं दुर्बल को भी साहसी बना देती हैं।

सूर्य अपने तेज से चमकता है, उधार मांगकर नहीं।

क्रोध मस्तिष्क को बुझा देता है।

धन और पेड़ की छाया समय के साथ-साथ घटते-बढते हैं।

एक बुराई दूसरी को जन्म देती है।

Friday, 19 July 2013

विचार-श्रंखला : जुलाई-II, 2013

विजयी वही होते हैं, जिन्हें अपने जीतने का विश्‍वास होता है।

किसी को भी अपने बल या बुद्धि पर घमण्ड नहीं करना चाकिए, किसी के परामर्श से ही सफलता मिलती है।


अधिक दुख और पतन के बाद ही अधिक उन्नति व हर्ष की बारी आती है।

मूर्खता क्या है, इसकी शुरुआत कहॉं से होती है, इसका बड़ा गहरा रहस्य है। हर व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में इसका अलग-अलग स्तर होता है।

उस दिन को बेकार ही समझो, जिस दिन तुम हंसे नहीं।

चिरस्थायी एकता वहीं सम्भव है, जहां अंत:करण एक हो।

बड़े सरकारी अधिकारियों के दोनों हाथों मे लड्डू होता है, वही खाते हैं और वही परोसते हैं।

कम्प्यूटर की तरह ही हमारा मस्तिष्क भी एक आज्ञाकारी सेवक है। उसे इस बात की परवाह नहीं होती कि हम उसे किस तरह के निर्देश दे रहे हैं।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पैसा बहुत महत्वपूर्ण चीज है। लेकिन चिन्ता की बात यह है कि हम पैसे को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण समझने लगे हैं।

अपनी योग्यता का, अपने धन का दूसरों के सहयोग के लिए, समाज के उपयोग के लिए लाना ही वास्तविक उपयोगी व्यक्ति होना है।

संसार में केवल पांच प्रतिशत लोग ही अपनी असीमित बुद्धि का 50 प्रतिशत इस्तेमाल कर पातें हैं। अत: तथाकथित मूर्खों की संख्या ज्यादा है। यह अजीब सा तथ्य है कि बुद्धि का कम प्रयोग करने वाले लोग सरल और निर्मल हृदय के होते हैं। शायद बुरा करने के लिए चातुर्य आवश्यक है और चातुर्य आते ही न जाने क्यों मनुष्य बुराई की राह को ज्यादा पसंद करने लगता है। यह जरूरी नहीं है कि हर बुद्धिमान बुराई के रास्ते पर ही जाता है। शेक्सपीयर के नाटकों में दरबारी विदूषक रहा है और अकबर के दरबार में बीरबल की मौजूदगी की बात है।

मन शुद्ध व पवित्र हो तो नरक में भी सुख है और मन यदि शुद्ध न हो तो स्वर्ग में भी सुख नहीं मिल सकता।

 यदि मन ही मैला है, तो तन के कपड़े धोने का कोई फायदा नहीं।

नाकामियों से घबराएं नहीं। ये सिर्फ सामने आने वाली रुकावटें ही हैं, जो आपको मजबूत बनती हैं।

सफलता ही सब कुछ नहीं है और नाकामी अंत नहीं है।

समस्याओं को नश्तर ही तरह प्रयोग करके ही असफलता के नासूर चीरे जा सकते हैं और दर्द की पीड़ा से उबरा जा सकता है।

व्यस्त आदमी के पास आंसू बहाने का समय नहीं होता।

पुस्तकों से विहिन घर खिड़कियों से विहिन भवन के समान है।

कर्मों के फलस्वरूप ही स्वर्ग नर्क की प्राप्ति होती है, किन्तु इनकी प्राप्ति मृत्यु के बाद ही नहीं, जीवित रहते हुए भी हो जाती हैं।

जो मस्तिष्क नकारात्मक बातों से मुक्त होता है वह हमेशा सकारात्मक परिणाम देता है। इसलिए अपने विचारों की सफाई कीजिए।

दुनिया एक खूबसूरत किताब है, मगर जो इसे पढ नहीं सकता, उसके लिए बेकार है।

स्त्रोत : प्रेसपालिका, 16-31 जुलाई, 2013

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